Government of India Act, 1935 ब्रिटिश भारत का सर्वाधिक विस्तृत संवैधानिक अभिलेख है, जिसने अपनी संघीय संरचना, प्रांतीय स्वायत्तता और प्रशासनिक तंत्र के माध्यम से स्वतंत्र भारत के संविधान की रूपरेखा को प्रत्यक्ष रूप से आकार दिया।
इस अधिनियम में ब्रिटिश भारतीय प्रांतों और देशी रियासतों को मिलाकर एक All India Federation की परिकल्पना की गई थी। किंतु रियासतों का परिग्रहण ऐच्छिक होने के कारण अपेक्षित संख्या में रियासतें कभी सम्मिलित नहीं हुईं, जिससे संघीय प्रावधान व्यवहार में निष्क्रिय ही रहे।
रक्षा और विदेश मामले स्पष्ट रूप से Governor-General के लिए आरक्षित रखे गए और ये संघीय विधायी नियंत्रण से परे थे। ये विषय निर्वाचित मंत्रियों के अधिकार-क्षेत्र से बाहर थे, जो सीमित स्वशासन देते हुए रणनीतिक संप्रभुता बनाए रखने की ब्रिटिश मंशा को दर्शाता है।
संघीय स्तर निष्क्रिय रहने के बावजूद, अधिनियम के Part II के अंतर्गत प्रांतीय स्वायत्तता 1937 में क्रियान्वित हुई। अधिकांश प्रांतों में निर्वाचित मंत्रिमंडलों ने पदभार ग्रहण किया, जिससे भारतीय राजनीतिक नेतृत्व को स्वतंत्रता-पश्चात शासन की एक महत्त्वपूर्ण पूर्वाभ्यास प्राप्त हुई।
तीन विधायी सूचियाँ, Federal Court, Public Service Commissions और आपातकालीन प्रावधान जैसे महत्त्वपूर्ण संरचनात्मक तत्त्व भारत के संविधान में समाहित किए गए, जिससे 1935 का अधिनियम गणराज्य के संवैधानिक ढाँचे का एक अपरिहार्य पूर्ववर्ती बन गया।
अधिनियम की संघीय परिकल्पना अपूर्ण रही, तथापि इसकी प्रशासनिक एवं विधायी संरचना ने स्वतंत्र भारत को गहराई से प्रभावित किया। इसका समुचित मूल्यांकन इसकी आकांक्षात्मक अभिकल्पना और औपनिवेशिक बाध्यताओं के अंतर्गत इसके आंशिक क्रियान्वयन के मध्य अंतर करने की माँग करता है।
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