भारत की विदेश नीति ने बहुध्रुवीय विश्व में दिशा निर्धारित करने हेतु सभ्यतागत विरासत और रणनीतिक स्वायत्तता को आधार बनाया है, जो केवल लेन-देन आधारित गठबंधनों से आगे बढ़कर राष्ट्रीय हित और सांस्कृतिक पहचान पर टिकी नीति की ओर संकेत करता है।
भारत का दृष्टिकोण कठोर गुट-संरेखण को अस्वीकार करते हुए मुद्दा-आधारित साझेदारियों को प्राथमिकता देता है, जिससे प्रतिस्पर्धी शक्तियों के साथ एक साथ संवाद संभव होता है। यह स्थिति भारत को संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और खाड़ी देशों के साथ संबंध संतुलित रखने में सक्षम बनाती है, बिना किसी एकल संरक्षक को संप्रभु हितों के अधीन किए।
भारत को 'Bharat' — एक सभ्यतागत राज्य — के रूप में प्रस्तुत करना, इसे केवल उत्तर-औपनिवेशिक राष्ट्र से परे दीर्घकालीन सांस्कृतिक एवं दार्शनिक परंपराओं में निहित वैश्विक भूमिका प्रदान करता है। यह आख्यान International Solar Alliance, Yoga diplomacy और Voice of the Global South शिखर सम्मेलनों जैसे मंचों के माध्यम से सॉफ्ट-पावर कूटनीति को सुदृढ़ करता है।
वर्ष 2023 में भारत की G20 Presidency ने वैश्विक शासन संस्थाओं को समकालीन शक्ति-संतुलन के अनुरूप पुनर्गठित करने की महत्वाकांक्षा को प्रतिबिंबित किया। African Union की स्थायी सदस्यता और विकासशील देशों के लिए ऋण-राहत ढाँचों की वकालत ने क्षेत्रीय सीमाओं से परे नेतृत्व की भूमिका को रेखांकित किया।
सीमा तनाव, व्यापार असमानताओं और प्रतिस्पर्धी घरेलू प्राथमिकताओं के बीच सभ्यतागत विमर्श को सुसंगत एवं क्रियाशील विदेश नीति में रूपांतरित करना कठिन बना रहता है। रणनीतिक स्वायत्तता की विश्वसनीयता के लिए आवश्यक है कि यह केवल घोषणात्मक मुद्रा न रहे, बल्कि ठोस परिणाम सुनिश्चित करे।
भारत की विदेश नीति का विकास सभ्यतागत आत्मविश्वास और व्यावहारिक राजनीति के समन्वय का वास्तविक प्रयास दर्शाता है। इस संतुलन को बनाए रखने के लिए संस्थागत गहराई, आर्थिक सामर्थ्य और उत्तरोत्तर प्रशासनों में कूटनीतिक निरंतरता अनिवार्य है।
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