दिसम्बर 2019 में Chief of Defence Staff के पद का सृजन, भारत की तीनों सशस्त्र सेवाओं में एकीकृत कमान एवं संयुक्तता प्राप्त करने हेतु लगभग दो दशकों की संस्थागत विचार-प्रक्रिया की परिणति था।
Kargil Review Committee (1999) ने सर्वप्रथम नागरिक-सैन्य समन्वय एवं अंतर-सेवा एकीकरण में गंभीर रिक्तताओं को रेखांकित किया। इसने सरकार को एकल-बिंदु सैन्य सलाहकार की अनुशंसा की, जो CDS की अवधारणात्मक आधारशिला बनी। तत्पश्चात् Group of Ministers Report (2001) ने इस अनुशंसा का समर्थन किया, किन्तु अंतर-सेवा आपत्तियों के कारण क्रियान्वयन स्थगित रहा।
पूर्ण CDS के प्रति राजनीतिक प्रतिरोध को देखते हुए Naresh Chandra Task Force (2012) ने Chiefs of Staff Committee के स्थायी अध्यक्ष पद को एक संक्रमणकालीन व्यवस्था के रूप में प्रस्तावित किया। यह व्यवस्था किसी एकल अधिकारी में अत्यधिक शक्ति-केंद्रण से बचते हुए समन्वय सुनिश्चित करती, जो रक्षा सुधारों के प्रति सतर्क एवं सहमति-आधारित दृष्टिकोण को प्रतिबिम्बित करती है।
Lieutenant General Shekatkar Committee (2016) ने मुख्यतः गैर-युद्धक प्रतिष्ठानों के पुनर्गठन द्वारा युद्धक क्षमता संवर्धन पर ध्यान केंद्रित किया। यद्यपि इसने व्यापक रक्षा आधुनिकीकरण को संबोधित किया, CDS पद की प्रत्यक्ष अनुशंसा का श्रेय पूर्ववर्ती समितियों को दिया जाना अधिक सटीक है। इसके अधिदेश को CDS अनुशंसा से समरूप मानना एक सामान्य भ्रांति है।
CDS एकल-बिंदु सैन्य सलाहकार के रूप में कार्य करता है तथा Department of Military Affairs का नेतृत्व करता है, जिससे खरीद, प्रशिक्षण एवं थिएटर कमांड में त्रि-सेवा संयुक्तता सुगम होती है। वास्तविक परिचालन समन्वय के लिए प्रभावी थिएटर कमांड एकीकरण अगला महत्त्वपूर्ण पड़ाव है।
एकीकृत रक्षा प्रबंधन की दिशा में भारत की यात्रा संस्थागत जड़ता एवं रणनीतिक आवश्यकता के मध्य तनाव को दर्शाती है। CDS ढाँचे की स्थिरता हेतु थिएटर कमांड का क्रमिक संचालन, सुदृढ़ नागरिक-सैन्य विश्वास तथा दीर्घकालिक संरचनात्मक स्थायित्व के लिए विधायी समर्थन अनिवार्य है।
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