भारत की वायु शक्ति विभिन्न प्रकार के स्थिर-पंख विमानों पर आधारित है, जो समुद्री निगरानी, रणनीतिक वायु-परिवहन और युद्धक अभियानों जैसी पृथक-पृथक भूमिकाएँ निभाते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा के विभिन्न आयामों को सुदृढ़ करते हैं।
Dornier-228 एक हल्का टर्बोप्रॉप विमान है, जिसे भारतीय नौसेना और तटरक्षक बल मुख्यतः समुद्री गश्त, तटीय निगरानी और खोज-एवं-बचाव अभियानों के लिए संचालित करते हैं। इसकी लघु-पट्टी क्षमता इसे Andaman और Nicobar तथा Lakshadweep जैसे द्वीप क्षेत्रों के लिए उपयुक्त बनाती है। HAL ने इसका लाइसेंस-प्राप्त संस्करण भी निर्मित किया है, जिससे स्वदेशी एयरोस्पेस विनिर्माण को बल मिला है।
Ilyushin IL-76 सोवियत/रूसी मूल का एक भारी रणनीतिक परिवहन विमान है, जिसे भारतीय वायु सेना भारी कार्गो, सैन्य बल-स्थानांतरण और मानवीय सहायता अभियानों के लिए उपयोग करती है — यह कोई सुपरसोनिक युद्धक मंच नहीं है। इसने आपदा राहत और उच्च-ऊँचाई वाले दूरस्थ क्षेत्रों में सैन्य रसद में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसे सुपरसोनिक युद्धक विमान के रूप में वर्गीकृत करना तथ्यात्मक त्रुटि है।
Boeing C-17 Globemaster III भारत का प्रमुख भारी-भार सैन्य परिवहन विमान है, जो Ladakh के Daulat Beg Oldi जैसी उच्च-ऊँचाई वाली अल्पविकसित हवाई पट्टियों पर भी अभियान संचालित करने में सक्षम है। इसने भारत की त्वरित तैनाती और HADR क्षमताओं को उल्लेखनीय रूप से सुदृढ़ किया है। C-17 के शामिल होने से IAF की रणनीतिक वायु-परिवहन क्षमता में गुणात्मक वृद्धि हुई।
विमानों का सटीक वर्गीकरण, खरीद-योजना, रखरखाव अनुबंधों और परिचालन सिद्धांत को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। भारत की Defence Acquisition Procedure क्षमता-आधारित नियोजन पर बल देती है, जिससे नई खरीद स्वीकृत होने से पूर्व विद्यमान परिसंपत्तियों की भूमिका की सुस्पष्ट परिभाषा अनिवार्य हो जाती है।
तीन युग्मों में से Dornier-228 और C-17 Globemaster III सही रूप से सुमेलित हैं; IL-76 एक परिवहन विमान है, सुपरसोनिक युद्धक जेट नहीं। परिसंपत्तियों की भूमिका की स्पष्टता विश्वसनीय रक्षा नियोजन की आधारशिला है।
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