2021 में Ordnance Factory Board के विघटन और सात नए Defence Public Sector Undertakings की स्थापना ने भारत के रक्षा विनिर्माण प्रशासन में एक संरचनात्मक परिवर्तन को चिह्नित किया, जो विभागीय प्रारूप से निगमीय प्रारूप की ओर संक्रमण को दर्शाता है।
OFB, जो रक्षा मंत्रालय के अधीन एक अधीनस्थ कार्यालय के रूप में कार्य करता था, अक्टूबर 2021 में विघटित किया गया। इसकी 41 आयुध निर्माणियों को सात नवगठित DPSUs में समाहित किया गया, जिनमें से प्रत्येक गोला-बारूद, वाहन, बख्तरबंद वाहन एवं इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी उत्पाद श्रेणियों में विशेषीकृत है। यह निगमीकरण था, निजीकरण नहीं — ये संस्थाएँ सरकारी स्वामित्व में ही रहती हैं।
विभागीय प्रारूप ने निर्माणियों को बाज़ार अनुशासन से पृथक रखा, जिसके परिणामस्वरूप लागत अतिक्रमण, गुणवत्ता संबंधी शिकायतें और बंधित रक्षा आदेशों पर निर्भरता उत्पन्न हुई। निगमीय संरचना बोर्ड-स्तरीय जवाबदेही, स्वतंत्र लेखापरीक्षा और वाणिज्यिक एवं निर्यात आदेशों की क्षमता प्रदान करती है, जो Aatmanirbhar Bharat रक्षा पहल के अनुरूप है।
यह पुनर्गठन भारत की एक प्रमुख रक्षा निर्यातक बनने की महत्त्वाकांक्षा को समर्थन देता है। DPSUs अब संयुक्त उद्यम स्थापित कर सकते हैं, प्रौद्योगिकी साझेदारी आकर्षित कर सकते हैं और वैश्विक अनुबंधों के लिए बोली लगा सकते हैं — ऐसे अवसर जो एक सरकारी विभाग के लिए संरचनात्मक रूप से उपलब्ध नहीं थे।
संक्रमण जोखिमों में कार्यबल का प्रतिरोध, विरासत पेंशन देनदारियाँ और दीर्घकालिक उत्पादन-आदेश संस्कृति वाले संगठनों में वाणिज्यिक दक्षता विकसित करने की चुनौती सम्मिलित है। नवस्वतंत्र संस्थाओं में गुणवत्ता मानकीकरण सुनिश्चित करने हेतु रक्षा मंत्रालय द्वारा सुदृढ़ विनियामक निगरानी भी अपेक्षित है।
निगमीकरण दक्षता के लिए संस्थागत ढाँचा निर्मित करता है, किंतु इसकी सफलता निरंतर प्रबंधन स्वायत्तता, प्रतिस्पर्धी खरीद प्रक्रियाओं और एक विश्वसनीय निर्यात रणनीति पर निर्भर करती है — ऐसी परिस्थितियाँ जिनके लिए संरचनात्मक परिवर्तन से परे सुविचारित नीतिगत संरक्षण आवश्यक है।
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