भारत का रक्षा शासन संवैधानिक प्रावधानों और कार्यकारी संरचनाओं के संगम पर संचालित होता है, जो सैन्य पर नागरिक सर्वोच्चता और परिचालन प्रभावशीलता के मध्य संतुलन स्थापित करता है — यह अभिकल्पना बदलती सुरक्षा चुनौतियों में परखी जाती रही है।
CCS की अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं और यह राष्ट्रीय सुरक्षा, परमाणु कमान निर्णयों तथा रणनीतिक महत्त्व के विषयों के लिए सर्वोच्च कार्यकारी निकाय है। इसमें रक्षा, गृह, वित्त और विदेश मंत्री सम्मिलित होते हैं। यह एक कार्यकारी निकाय है, जो किसी संवैधानिक अनुच्छेद के बजाय मंत्रिमंडल प्रणाली से अपना प्राधिकार प्राप्त करता है।
Article 53 रक्षा बलों की सर्वोच्च कमान राष्ट्रपति में निहित करता है, किंतु Article 74 यह अनिवार्य करता है कि राष्ट्रपति समस्त कार्यकारी कार्यों में मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करें। न्यायालयों ने निरंतर यह अभिनिर्धारित किया है कि यह परंपरा बाध्यकारी है, अर्थात् तैनाती और परिचालन विषयों सहित रक्षा निर्णयों पर नागरिक मंत्रिमंडल का प्रभावी नियंत्रण रहता है।
CDS का पद 2019 में संवैधानिक संशोधन या Article 53 के माध्यम से नहीं, बल्कि कार्यकारी आदेश द्वारा सृजित किया गया। यह एक वैधानिक-प्रशासनिक पद है, जिसका उद्देश्य तीनों सेवाओं का एकीकरण करना और सरकार को एकल-बिंदु सैन्य परामर्श प्रदान करना है। इसे संवैधानिक पद के रूप में प्रस्तुत करना इसके विधिक आधार की गलत व्याख्या होगी।
भारत का ढाँचा नागरिक नियंत्रण को दृढ़ता से स्थापित करता है: रक्षा मंत्री मंत्रालय का नेतृत्व करते हैं, CCS रणनीतिक दिशा निर्धारित करती है और सेना उन्हीं मानकों के भीतर कार्य करती है। CDS संयुक्तता को सुदृढ़ करता है, किंतु संवैधानिक पदानुक्रम को परिवर्तित नहीं करता।
कथन 1 और 2 सही हैं; कथन 3 गलत है। सुदृढ़ रक्षा शासन के लिए इन भेदों की स्पष्टता आवश्यक है — कार्यकारी संरचनाओं को संवैधानिक प्रावधानों से जोड़ना उत्तरदायित्व और संस्थागत अभिकल्पना को विकृत कर सकता है।
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