Article 280 के अंतर्गत गठित 15वें वित्त आयोग ने 2021-26 की अवधि हेतु अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया, जिसने महामारी-पश्चात आर्थिक दबाव और सहकारी संघवाद की बदलती माँगों के बीच केंद्र-राज्य राजकोषीय संबंधों को नया स्वरूप प्रदान किया।
15वें वित्त आयोग ने विभाज्य केंद्रीय करों की निवल आय का 41% राज्यों को हस्तांतरित करने की अनुशंसा की, जो 14वें वित्त आयोग के 42% से मामूली कम है। यह कमी मुख्यतः नवगठित केंद्रशासित प्रदेशों Jammu & Kashmir और Ladakh को समायोजित करने हेतु की गई। यह ऊर्ध्वाधर हिस्सेदारी राजकोषीय अंतरण का मूलभूत आधार बनी रहती है।
आयोग ने जनसांख्यिकीय प्रदर्शन को एक नए मानदंड के रूप में सम्मिलित किया, जिससे जनसंख्या वृद्धि को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने वाले राज्यों को प्रोत्साहन मिला। आय-दूरी और क्षेत्रफल-आधारित मानदंड भी बनाए रखे गए, जबकि कर-प्रयास मानदंड को पुनः शामिल कर राज्यों की स्वयं की राजस्व संग्रहण क्षमता को प्रोत्साहित किया गया — यह प्रदर्शन-आधारित संघवाद की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन है।
स्वास्थ्य, शिक्षा और स्थानीय निकायों हेतु प्रदर्शन-शर्तों से संबद्ध अनुदानों की अनुशंसा की गई। शिक्षा से जुड़े अनुदान अधिगम परिणामों में सुधार पर केंद्रित थे तथा इनका आवंटन मापनीय संकेतकों से जोड़ा गया, न कि बिना शर्त हस्तांतरण से। इससे राज्यों को परिणाम-आधारित शासन की ओर प्रेरित किया गया।
आयोग ने कृषि क्षेत्र के सुधारों — जिनमें बाजार उदारीकरण और भूमि-पट्टा सुधार सम्मिलित हैं — से जुड़े प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहनों की अनुशंसा की। तथापि कृषि विधान से जुड़ी राजनीतिक संवेदनशीलताओं के कारण राज्यों द्वारा इनका वास्तविक अनुपालन सीमित रहा।
15वें वित्त आयोग की संरचना अनुदानों को परिणामों से जोड़कर और राजकोषीय अनुशासन को पुरस्कृत कर समता एवं दक्षता के मध्य संतुलन स्थापित करती है। इसका निरंतर क्रियान्वयन राज्यों की प्रशासनिक क्षमता और केंद्र-राज्य विश्वास पर निर्भर करता है, जो दोनों ही अभी विकासशील अवस्था में हैं।
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