Justice K.S. Puttaswamy v. Union of India (2017) में उच्चतम न्यायालय के सर्वसम्मत निर्णय ने निजता के अधिकार को Article 21 के अंतर्भूत मौलिक अधिकार के रूप में स्थापित किया, जिसने भारत के संवैधानिक एवं विनियामक परिदृश्य को पुनर्परिभाषित किया।
नौ-न्यायाधीशीय पीठ ने निजता को Article 21 (जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) में अवस्थित किया, साथ ही Articles 14 और 19 का भी आश्रय लिया। इस त्रिस्तरीय आधार के अनुसार राज्य के किसी भी हस्तक्षेप को वैधता, वैध उद्देश्य और आनुपातिकता की कसौटी पर खरा उतरना अनिवार्य है।
इस निर्णय ने M.P. Sharma और Kharak Singh प्रकरणों को, जिन्होंने निजता को संवैधानिक दर्जा देने से इनकार किया था, स्पष्ट रूप से अभिखंडित किया। इस सुधारात्मक कदम ने भारतीय विधिशास्त्र को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों एवं लोकतांत्रिक संविधानवाद के अनुरूप स्थापित किया।
इस निर्णय ने Digital Personal Data Protection Act, 2023 के अधिनियमन को प्रेरित किया, जिसने डेटा न्यासियों, सहमति-तंत्र और Data Protection Board हेतु वैधानिक ढाँचा स्थापित किया। प्रभावी क्रियान्वयन अभी भी प्रगति पर है, विशेषतः राज्य निगरानी संबंधी छूट के प्रावधानों के संदर्भ में।
राष्ट्रीय सुरक्षा, Aadhaar-आधारित कल्याण वितरण और विधि-प्रवर्तन जैसे वैध राज्य हितों के साथ निजता का संतुलन सुदृढ़ संस्थागत सुरक्षा उपायों की माँग करता है। कार्यपालिका के अतिक्रमण को रोकने हेतु न्यायिक निगरानी, स्वतंत्र विनियामक निकाय और स्पष्ट आनुपातिकता मानक अपरिहार्य हैं।
मौलिक अधिकार के रूप में निजता को केवल न्यायिक मान्यता नहीं, बल्कि एक ऐसी संस्थागत संरचना की आवश्यकता है जो आनुपातिकता को व्यावहारिक रूप दे। भारत के डेटा शासन ढाँचे को इस अधिकार को आकांक्षात्मक से वास्तविक बनाने की दिशा में निरंतर विकसित होना होगा।
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