मातृ मृत्यु दर भारत में एक गंभीर शासन-संबंधी चुनौती बनी हुई है। Pradhan Mantri Surakshit Matritva Abhiyan (PMSMA) को गुणवत्तापूर्ण प्रसवपूर्व देखभाल को संस्थागत रूप देने तथा उच्च-जोखिम गर्भावस्थाओं हेतु सुनिश्चित सेवाएँ प्रदान करने के उद्देश्य से प्रारंभ किया गया।
PMSMA के अंतर्गत गर्भवती महिलाओं को, विशेष रूप से दूसरी और तीसरी तिमाही में, प्रत्येक माह की 9 तारीख को सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर प्रसवपूर्व देखभाल सेवाओं का न्यूनतम पैकेज सुनिश्चित किया जाता है। प्रसव के पश्चात् छह माह की देखभाल इस योजना के अंतर्गत नहीं आती — वह पृथक मातृ स्वास्थ्य कार्यक्रमों के अधीन है। यह विभाजन नीति-कार्यान्वयन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।
PMSMA की एक विशिष्ट विशेषता इसका सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल है। निजी क्षेत्र के प्रसूति रोग विशेषज्ञ, स्त्री रोग विशेषज्ञ, रेडियोलॉजिस्ट एवं चिकित्सक निर्धारित दिनों पर निकटवर्ती सरकारी सुविधाओं में स्वैच्छिक सेवाएँ देने हेतु आमंत्रित किए जाते हैं। यह व्यवस्था अर्ध-शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक सुविधाओं की विशेषज्ञ क्षमता की कमी को पूरा करती है।
यह योजना उच्च-जोखिम गर्भावस्थाओं की जाँच एवं शीघ्र पहचान को प्राथमिकता देती है — जैसे रक्ताल्पता, उच्च रक्तचाप और गर्भकालीन मधुमेह। इन मामलों को चिह्नित करने से लक्षित रेफरल एवं अनुवर्ती कार्रवाई संभव होती है, जो मातृ मृत्यु के निवारणीय कारणों को सीधे संबोधित करती है।
सुव्यवस्थित संरचना के बावजूद, निजी स्वयंसेवकों की अनियमित भागीदारी, दूरस्थ क्षेत्रों में लाभार्थियों के बीच कम जागरूकता तथा नैदानिक उपभोग्य सामग्री की अनियमित आपूर्ति कार्यक्रम की प्रभावशीलता को सीमित करती है। जिला-स्तरीय निगरानी को सुदृढ़ करना और ASHA कार्यकर्ताओं के माध्यम से सामुदायिक संगठन आवश्यक है।
PMSMA का हाइब्रिड मॉडल — सुनिश्चित सार्वजनिक सेवाएँ एवं निजी स्वैच्छिक भागीदारी — संरचनात्मक दृष्टि से सुदृढ़ है, किंतु इसका प्रभाव निरंतर कार्यान्वयन, विशेषज्ञ सहभागिता और व्यापक प्रजनन एवं बाल स्वास्थ्य ढाँचे के साथ एकीकरण पर निर्भर करता है।
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