52वें संविधान संशोधन (1985) द्वारा सम्मिलित दसवीं अनुसूची, व्यक्तिगत लाभ हेतु विधायकों द्वारा दल-परिवर्तन से उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता को नियंत्रित करती है और लोकतांत्रिक जवाबदेही को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है।
कोई विधायक अयोग्य घोषित होता है यदि वह स्वेच्छा से अपने राजनीतिक दल की सदस्यता त्यागता है अथवा पूर्व अनुमति के बिना दल के निर्देश के विरुद्ध मतदान करता है या मतदान से विरत रहता है। दूसरे आधार में यह शर्त भी है कि दल ने पंद्रह दिनों के भीतर उस कृत्य को माफ न किया हो — यह सशर्तता अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
Ravi S. Naik v. Union of India में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 'स्वैच्छिक परित्याग' के लिए औपचारिक त्यागपत्र आवश्यक नहीं; संबंध-विच्छेद का संकेत देने वाला आचरण भी पर्याप्त है। निर्वाचन के पश्चात् यह कृत्य अयोग्यता को आकर्षित करता है, अतः इसे सर्वथा छूट प्राप्त मानना तथ्यतः असंगत है।
सदन का अध्यक्ष अयोग्यता याचिकाओं हेतु अधिकरण के रूप में कार्य करता है, जिस व्यवस्था की पक्षपातपूर्ण निर्णयन के लिए आलोचना होती रही है। Kihoto Hollohan v. Zachillhu में उच्चतम न्यायालय ने अनुसूची की वैधता बनाए रखते हुए अध्यक्ष के निर्णयों को न्यायिक पुनरीक्षण के अधीन माना।
किसी दल के कम-से-कम दो-तिहाई विधायक सदस्यों का किसी अन्य दल में विलय उन सदस्यों को अयोग्यता से मुक्त रखता है। व्यक्तिगत असहमति रखने वाले सदस्यों को कोई समतुल्य संरक्षण प्राप्त नहीं है, जिससे वर्तमान ढाँचे में सैद्धांतिक विधायी स्वतंत्रता का दायरा सीमित हो जाता है।
दसवीं अनुसूची दलीय अनुशासन और विधायी स्वायत्तता के मध्य संतुलन स्थापित करती है, किंतु अध्यक्ष द्वारा निर्णयन जैसी संस्थागत रिक्तियाँ संरचनात्मक सुधार की माँग करती हैं — संभवतः अयोग्यता की शक्ति किसी स्वतंत्र संवैधानिक प्राधिकरण को सौंपी जाए।
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