भारत के संविधान में कई स्व-परिभाषित प्रावधान हैं जो इसकी अपनी पहचान, प्रारंभ तिथि और पूर्ववर्ती औपनिवेशिक विधानों से संबंध स्थापित करते हैं — ये प्रावधान प्रायः अनदेखे रहते हैं, किंतु संवैधानिक निरंतरता की दृष्टि से मूलभूत हैं।
Article 393 इस दस्तावेज़ को स्पष्ट रूप से 'the Constitution of India' के रूप में अभिहित करता है, जिससे कथन 1 असत्य सिद्ध होता है। यह प्रावधान कानूनी दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है — यह समस्त न्यायिक व्याख्याओं और विधायी संदर्भों को एक अधिकृत शीर्षक से जोड़ता है तथा संवैधानिक विमर्श में अस्पष्टता को समाप्त करता है।
Article 395 Indian Independence Act, 1947 और Government of India Act, 1935 दोनों को, उनके अनुकूलनों सहित, स्पष्ट रूप से निरसित करता है, अतः कथन 2 असत्य है। यह निरसन खंड संवैधानिक सर्वोच्चता स्थापित करने और औपनिवेशिक शासन-ढाँचे के साथ औपचारिक कानूनी निरंतरता को विच्छिन्न करने हेतु अनिवार्य था।
Article 394 यह निर्दिष्ट करता है कि संविधान के अधिकांश प्रावधान 26 जनवरी, 1950 को प्रवृत्त हुए, जिससे कथन 3 असत्य होता है। निर्वाचन, नागरिकता और अनंतिम संसद से संबंधित कुछ प्रावधान संविधान के अंगीकरण की तिथि से ही प्रभावी हुए, जो एक चरणबद्ध कार्यान्वयन की परिकल्पना को दर्शाता है।
ये अंतिम अनुच्छेद केवल औपचारिकताएँ नहीं हैं; ये संवैधानिक व्यवस्था की कालिक और आदर्शात्मक सीमाएँ निर्धारित करते हैं। प्रशासकों और न्यायालयों के लिए ये कानूनी उत्तराधिकार, पूर्व-संवैधानिक विधियों की वैधता तथा उस सटीक क्षण को स्पष्ट करते हैं जब से मूल अधिकार और नीति-निदेशक तत्त्व प्रभावी हुए।
तीनों कथन तथ्यात्मक रूप से असत्य हैं, क्योंकि Articles 393, 394 और 395 प्रत्येक दावे को प्रत्यक्षतः संबोधित करते हैं। ये प्रावधान सामूहिक रूप से संविधान के स्वयंपूर्ण, संप्रभु स्वरूप को — औपनिवेशिक विधिक संरचना से स्पष्ट विच्छेद को — रेखांकित करते हैं।
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