Article 123 के अंतर्गत राष्ट्रपति की अध्यादेश-निर्माण शक्ति एक कार्यकारी उपकरण है, जो संसद के सत्र में न होने पर विधायी आवश्यकता की पूर्ति करती है, किंतु इसकी वैधता और परिधि को स्पष्ट संवैधानिक सीमाएँ परिभाषित करती हैं।
एक अध्यादेश को संसद के अधिनियम के समान बल और प्रभाव प्राप्त होता है। फलस्वरूप, यह किसी भी विद्यमान केंद्रीय अधिनियम में संशोधन, निरसन या परिवर्तन कर सकता है, बशर्ते विषय-वस्तु संसद की विधायी सक्षमता के अंतर्गत हो। इस प्रकार अध्यादेश एक सशक्त, यद्यपि अस्थायी, विधायी साधन है।
कोई भी अध्यादेश, सामान्य विधान की भाँति, संविधान के Part III के अंतर्गत प्रत्याभूत मूल अधिकारों का अतिक्रमण नहीं कर सकता। यह असंवैधानिकता के आधार पर न्यायिक पुनरावलोकन के अधीन है। न्यायालयों ने मूल अधिकारों का उल्लंघन करने वाले अध्यादेशों को निरस्त किया है, जिससे अध्यादेश मार्ग से कार्यपालिका की अतिशयता पर अंकुश लगता है।
किसी अध्यादेश को पूर्वव्यापी प्रभाव दिया जा सकता है, अर्थात् यह अपनी उद्घोषणा से पूर्व की किसी तिथि से लागू हो सकता है। यह संवैधानिक दृष्टि से अनुमन्य है, जब तक यह मूल अधिकारों या Article 20 के अंतर्गत पूर्वव्यापी आपराधिक दायित्व के निषेध जैसे संवैधानिक उपबंधों का उल्लंघन न करे।
विधायी जाँच से बचने के लिए अध्यादेशों की बार-बार पुनः उद्घोषणा को न्यायिक रूप से अस्वीकृत किया गया है। उच्चतम न्यायालय ने D.C. Wadhwa v. State of Bihar में अभिनिर्धारित किया कि व्यवस्थित पुनः उद्घोषणा संवैधानिक योजना को विकृत करती है और यह स्पष्ट किया कि अध्यादेश शक्ति संसदीय विचार-विमर्श का विकल्प नहीं, अपितु एक सुरक्षा-वाल्व है।
तीनों कथन सही हैं, जो अध्यादेश-निर्माण शक्ति की व्यापक किंतु परिसीमित प्रकृति को दर्शाते हैं। सुशासन की माँग है कि यह शक्ति आपातकालीन साधन बनी रहे, संयम के साथ प्रयुक्त हो और शीघ्र संसदीय अनुसमर्थन के अधीन रहे।
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