73वें संवैधानिक संशोधन ने पंचायती राज को शासन के तीसरे स्तर के रूप में संस्थागत रूप दिया। इसमें संरचना, सदस्यता पात्रता और वित्तीय हस्तांतरण से संबंधित विशिष्ट प्रावधान सम्मिलित हैं, जिन्हें क्रियान्वयन स्तर पर प्रायः भ्रामक रूप से समझा जाता है।
संविधान सभी राज्यों में मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत गठन को अनिवार्य नहीं करता। बीस लाख से अधिक जनसंख्या न रखने वाले राज्यों को इस स्तर के गठन से छूट प्राप्त है। अतः छोटे राज्य केवल दो स्तरों — ग्राम और जिला — पर कार्य कर सकते हैं, जिससे कथन I असत्य सिद्ध होता है।
पंचायत की सदस्यता के लिए संवैधानिक न्यूनतम आयु इक्कीस वर्ष है, न कि तीस वर्ष। तीस वर्ष की आयु Article 84 के अंतर्गत Rajya Sabha की सदस्यता से संबंधित है। अतः कथन II संवैधानिक दृष्टि से असत्य है।
Article 243-I के अंतर्गत पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा और कर आय के वितरण की अनुशंसा हेतु State Finance Commission का गठन मुख्यमंत्री द्वारा नहीं, अपितु राज्यपाल द्वारा किया जाता है। यह विशिष्टता आयोग के स्वतंत्र संवैधानिक स्वरूप को सुरक्षित रखती है। अतः कथन III भी असत्य है।
ये प्रावधान सामूहिक रूप से यह निर्धारित करते हैं कि राजकोषीय संसाधन स्थानीय निकायों तक किस प्रकार प्रवाहित होते हैं। यदि मुख्यमंत्री द्वारा Finance Commission का गठन किया जाए, तो यह संस्थागत स्वतंत्रता को क्षीण करेगा और Part IX में परिकल्पित विकेंद्रीकृत शासन की भावना को आघात पहुँचाएगा।
तीनों कथन संवैधानिक दृष्टि से असत्य हैं। पंचायती राज को सुदृढ़ करने के लिए प्रशासकों को इन प्रावधानों का सटीक अनुप्रयोग करना आवश्यक है, क्योंकि जमीनी स्तर पर संरचनात्मक एवं राजकोषीय विकृतियाँ सेवा-प्रदायगी और लोकतांत्रिक जवाबदेही को प्रत्यक्ष रूप से बाधित करती हैं।
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