IAEA परमाणु अप्रसार, शांतिपूर्ण ऊर्जा उपयोग और वैश्विक सुरक्षा संरचना के संगम पर स्थित है — इसलिए इसका अधिदेश, शासन-संरचना और UN प्रणाली के साथ संबंध अंतर्राष्ट्रीय स्थिरता की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
IAEA एक स्वायत्त अंतर-सरकारी संगठन है, न कि UN Charter के कठोर अर्थ में कोई विशेष अभिकरण। यह UN के साथ संबंध-समझौते के अंतर्गत कार्य करता है और अनुपालन-उल्लंघन के मामलों में General Assembly तथा Security Council दोनों को प्रतिवेदन प्रस्तुत करता है, किंतु अपने स्वयं के विधान के माध्यम से स्वतंत्र शासन बनाए रखता है।
वर्ष 2005 का Nobel Peace Prize संयुक्त रूप से IAEA और तत्कालीन महानिदेशक Mohamed ElBaradei को परमाणु ऊर्जा के सैन्य उपयोग को रोकने के प्रयासों हेतु प्रदान किया गया। इस पुरस्कार ने अप्रसार व्यवस्था के संरक्षक के रूप में IAEA की आदर्शात्मक प्रतिष्ठा को सुदृढ़ किया।
IAEA का Board of Governors 35 सदस्यों से मिलकर बना है — कुछ उन्नत परमाणु प्रौद्योगिकी के आधार पर नामित और कुछ General Conference द्वारा निर्वाचित। भारत Board में भागीदारी करता है, किंतु उसके पास स्थायी सीट नहीं है; उसकी सदस्यता क्षेत्रीय आवर्तन और परमाणु क्षमता मानदंडों पर आधारित है।
वर्ष 2008 के भारत-विशिष्ट सुरक्षा उपाय समझौते के पश्चात् भारत ने अपनी कुछ नागरिक परमाणु सुविधाओं को IAEA निरीक्षण के अंतर्गत रखा। Non-Proliferation Treaty के ढाँचे से बाहर यह व्यवस्था, भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को समायोजित करते हुए सुरक्षा उपायों के विस्तार में IAEA की व्यावहारिक भूमिका को प्रतिबिंबित करती है।
IAEA की प्रभावशीलता संप्रभु संवेदनशीलताओं और कठोर सत्यापन अधिदेशों के मध्य संतुलन पर निर्भर करती है। इसके निरीक्षण प्राधिकार को सुदृढ़ करना और सुरक्षा उपाय समझौतों को सार्वभौमिक बनाना एक विश्वसनीय वैश्विक परमाणु व्यवस्था के लिए अनिवार्य है।
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