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International Relations / Conventions Ratified by India — UPSC मुख्य परीक्षा मॉडल उत्तर

Polity · UPSC CSE
प्रश्न: भारत द्वारा अनुसमर्थित न किए गए अंतर्राष्ट्रीय अभिसमय और संधियाँ — महत्त्व, अंतराल और शासन पर निहितार्थ

प्रस्तावना

अंतर्राष्ट्रीय अभिसमयों के प्रति भारत का चयनात्मक अनुसमर्थन, संप्रभु नीति-स्वायत्तता और वैश्विक मानक-प्रतिबद्धताओं के मध्य एक सुविचारित संतुलन को दर्शाता है, जिसके श्रम अधिकारों, प्रवासन शासन और मानवीय दायित्वों पर गंभीर निहितार्थ हैं।

मुख्य बिंदु

1. भारत का अनुसमर्थन रिकॉर्ड — एक मिश्रित चित्र

भारत ने ILO के कई मूल अभिसमयों को अनुसमर्थित किया है, जिनमें बंधुआ श्रम और रोजगार नीति से संबंधित अभिसमय सम्मिलित हैं। Geneva Conventions पर भी भारत हस्ताक्षरकर्ता है। तथापि, UN Convention on the Protection of the Rights of All Migrant Workers and Members of Their Families तथा Convention on the Reduction of Statelessness को अनुसमर्थित नहीं किया गया है, जो संप्रभुता एवं घरेलू नीति-लचीलेपन की चिंताओं को प्रतिबिंबित करता है।

2. प्रवासी श्रमिक अभिसमय — शासन अंतराल

Migrant Workers Convention के अनुसमर्थन के अभाव में विदेशों में कार्यरत करोड़ों भारतीय श्रमिकों तथा भारत में कार्यरत विदेशी श्रमिकों की सुरक्षा हेतु एक मानक-शून्यता उत्पन्न होती है। द्विपक्षीय श्रम समझौते इस अंतराल को आंशिक रूप से भरते हैं, किंतु वे बहुपक्षीय ढाँचे की प्रवर्तनीयता और व्यापकता से रहित हैं।

3. राज्यविहीनता अभिसमय — घरेलू निहितार्थ

Convention on the Reduction of Statelessness का अनुसमर्थन न होना, नागरिकता, National Register of Citizens और अनिर्दिष्ट जनसंख्या की स्थिति से संबंधित चल रही बहसों से जुड़ता है। इस अभिसमय का अनुसमर्थन ऐसे दायित्व आरोपित करेगा जो वर्तमान घरेलू विधायी दृष्टिकोणों से टकरा सकते हैं।

4. चयनात्मक सहभागिता का रणनीतिक औचित्य

भारत का दृष्टिकोण नीति-स्वायत्तता को प्राथमिकता देता है, विशेषतः श्रम बाज़ार विनियमन और आव्रजन नियंत्रण के क्षेत्र में। व्यापक दायित्वों वाले अभिसमयों के अनुसमर्थन हेतु घरेलू विधायी समन्वय आवश्यक है, जिसके लिए पर्याप्त प्रशासनिक एवं राजनीतिक सहमति अपेक्षित होती है।

निष्कर्ष

चयनात्मक अनुसमर्थन स्वाभाविक रूप से प्रतिगामी नहीं है, किंतु प्रवासी सुरक्षा और राज्यविहीनता के क्षेत्र में विद्यमान अंतराल के लिए या तो आरक्षणों सहित अनुसमर्थन अथवा अंतर्राष्ट्रीय मानकों को वास्तविक रूप से पूर्ण करने वाले सुदृढ़ घरेलू विधायी विकल्पों की आवश्यकता है।

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