भारत में न्यायिक स्वतंत्रता को संरचनात्मक रूप से सुरक्षित रखने हेतु उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया को जानबूझकर कठोर बनाया गया है, जिससे महाभियोग एक सामान्य जवाबदेही तंत्र न होकर संवैधानिक सुरक्षा कवच बन जाता है।
Article 124(4) के अंतर्गत किसी न्यायाधीश को केवल सिद्ध कदाचार या असमर्थता के आधार पर ही हटाया जा सकता है। इसके लिए प्रत्येक सदन की कुल सदस्यता के बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पारित प्रस्ताव आवश्यक है, जो व्यापक संसदीय सहमति सुनिश्चित करता है।
Judges (Inquiry) Act के अनुसार, प्रस्ताव की सूचना स्वीकृत होने पर अध्यक्ष या सभापति एक तीन-सदस्यीय जाँच समिति गठित करते हैं, जिसमें उच्चतम न्यायालय का एक वर्तमान न्यायाधीश, एक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और एक विशिष्ट विधिवेत्ता सम्मिलित होते हैं। राष्ट्रपति इस प्रक्रिया की पूर्णता के पश्चात् ही कार्यवाही करते हैं, जो राजनीति-प्रेरित निष्कासन प्रयासों से न्यायपालिका की रक्षा करता है।
भारत के संवैधानिक इतिहास में अब तक किसी भी उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को महाभियोग द्वारा सफलतापूर्वक नहीं हटाया गया। सर्वाधिक उल्लेखनीय प्रयास — 1993 में Justice V. Ramaswami के विरुद्ध प्रस्ताव — Lok Sabha में असफल रहा, क्योंकि सत्तारूढ़ दल ने मतदान से विरत रहकर यह दर्शाया कि राजनीतिक परिस्थितियाँ इस प्रक्रिया को किस प्रकार जटिल बना सकती हैं।
उच्च प्रक्रियागत मानदंड एक सुविचारित संवैधानिक अभिकल्पना को दर्शाता है — कार्यपालिका और विधायिका के अतिक्रमण से न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए लोकतांत्रिक जवाबदेही बनाए रखना। तथापि, आलोचकों का मत है कि इससे निष्कासन व्यावहारिक रूप से असंभव हो जाता है, जो न्यायिक कदाचार में जवाबदेही को कमज़ोर करता है।
न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही के मध्य संतुलन एक अनसुलझा संवैधानिक तनाव बना हुआ है। आंतरिक तंत्रों को सुदृढ़ करना और पारदर्शी आचरण मानदंड स्थापित करना, केवल अव्यावहारिक महाभियोग मार्ग पर निर्भर रहने की तुलना में अधिक प्रभावी जवाबदेही ढाँचा प्रदान कर सकता है।
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