पंचायती राज संस्थाएँ (PRIs) भारत में लोकतांत्रिक शासन का आधारभूत स्तर हैं, तथापि उनकी क्षमता-संबंधी कमियाँ प्रभावी सेवा-प्रदायगी को बाधित करती हैं। पुनर्गठित RGSA इसी अंतराल को संस्थागत एवं मानव संसाधन क्षमता-निर्माण के माध्यम से दूर करता है।
पुनर्गठित RGSA 1 अप्रैल 2022 से 31 मार्च 2026 तक सभी राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में क्रियान्वित है। यह पूर्ववर्ती क्षमता-निर्माण पहलों को एक एकीकृत, परिणाम-उन्मुख ढाँचे में समेकित करता है, जो राष्ट्रीय विकास प्राथमिकताओं के अनुरूप है।
पुनर्गठित RGSA की एक विशिष्ट विशेषता इसका Sustainable Development Goals से स्पष्ट संबद्धता है। PRIs से अपेक्षित है कि वे Gram Panchayat Development Plans (GPDPs) तैयार करें, जो स्थानीय हस्तक्षेपों को नौ विषयगत SDG समूहों से जोड़ें, जिससे वैश्विक लक्ष्य स्थानीय स्तर पर क्रियाशील हों।
योजना में विभेदित वित्त-पोषण संरचना है: सामान्य श्रेणी के राज्यों हेतु केंद्र 60% व्यय वहन करता है, जबकि पूर्वोत्तर एवं विशेष श्रेणी के राज्यों को 90% केंद्रीय वित्त-पोषण प्राप्त होता है। विधानमंडल-रहित केंद्रशासित प्रदेशों को 100% केंद्रीय निधि मिलती है। यह क्रमिक दृष्टिकोण राज्यों को शासन-सुधार में सह-निवेश हेतु प्रोत्साहित करता है।
योजना के अंतर्गत State Institutes of Rural Development (SIRDs) एवं अन्य संस्थाओं के माध्यम से निर्वाचित प्रतिनिधियों, पंचायत कार्यकर्ताओं तथा सामुदायिक संसाधन व्यक्तियों का प्रशिक्षण किया जाता है। पंचायत प्रशासन के आधुनिकीकरण हेतु e-Governance उपकरण एवं डिजिटल साक्षरता घटक भी एकीकृत किए गए हैं।
प्रभावी विकेंद्रीकरण के लिए केवल संवैधानिक अधिदेश पर्याप्त नहीं, सतत संस्थागत क्षमता भी अनिवार्य है। RGSA का SDG-संबद्ध, प्रौद्योगिकी-सक्षम दृष्टिकोण एक विश्वसनीय मार्ग प्रस्तुत करता है, बशर्ते राज्य क्रियान्वयन की निष्ठा एवं मापनीय स्थानीय शासन परिणामों में निवेश करें।
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