1990 के दशक से क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने भारत की संघीय लोकतांत्रिक संरचना को पुनर्आकार दिया है। सामाजिक आंदोलनों, जाति-समेकन और राष्ट्रीय दलों के विभाजन से उभरे ये दल केंद्र एवं राज्यों में गठबंधन शासन को मौलिक रूप से प्रभावित करते हैं।
Rashtriya Janata Dal की स्थापना 1997 में Janata Dal से अलग होकर बिहार में OBC एवं अल्पसंख्यक वर्गों को एकजुट करने हेतु हुई। Nationalist Congress Party 1999 में Indian National Congress से नेतृत्व एवं विचारधारा के प्रश्नों पर विभाजन के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आई। All India Trinamool Congress की स्थापना 1998 में पश्चिम बंगाल में वाम वर्चस्व के विरुद्ध स्वतंत्र राजनीतिक अभिव्यक्ति के रूप में हुई।
United Progressive Alliance एवं National Democratic Alliance के कार्यकाल में क्षेत्रीय दल केंद्र में गठबंधन सरकारों को स्थिरता प्रदान करने में निर्णायक रहे। संसद में इनकी सौदेबाजी की शक्ति ने राष्ट्रीय दलों को नीति-निर्माण में क्षेत्रीय विकास प्राथमिकताओं, भाषाई पहचान और राज्य-विशिष्ट कल्याणकारी मांगों को समायोजित करने पर बाध्य किया।
क्षेत्रीय दल प्रायः लक्षित सामाजिक कल्याण योजनाएँ क्रियान्वित करते हैं और विशिष्ट समुदायों के प्रति निकटतर निर्वाचन-जवाबदेही बनाए रखते हैं। तथापि, वंशवादी उत्तराधिकार, व्यक्ति-केंद्रित नेतृत्व संरचना और सीमित आंतरिक लोकतंत्र ऐसी शासन-संबंधी चिंताएँ हैं जिन्हें Election Commission of India ने बार-बार रेखांकित किया है।
Election Commission मत-प्रतिशत की निर्धारित सीमाओं के आधार पर दलों को 'राज्य दल' अथवा 'राष्ट्रीय दल' के रूप में मान्यता देता है, जिससे आरक्षित चुनाव-चिह्न और राज्य संसाधनों तक पहुँच निर्धारित होती है। विधायी सुधार के माध्यम से आंतरिक दलीय लोकतंत्र को सुदृढ़ करना अभी भी एक अनसुलझी नीतिगत चुनौती बनी हुई है।
क्षेत्रीय दल भारत के बहुलवादी लोकतंत्र के परिधीय नहीं, बल्कि संरचनात्मक स्तंभ हैं। इनकी प्रतिनिधित्व-संबंधी जीवंतता को संस्थागत जवाबदेही और पारदर्शी आंतरिक शासन के साथ संतुलित करना ही इनके दीर्घकालिक लोकतांत्रिक योगदान को सुनिश्चित करेगा।
GS Answer Coach आपके उत्तर को Introduction, Body, Conclusion के आधार पर परखता है — 30 सेकंड में।
Essay Coach · GS Answer Coach · Cutoff Planner · 500+ Mains PYQs — साइन अप मुफ्त।