भारत की दिव्यांगता अधिकार संरचना कल्याण-केंद्रित मॉडल से अधिकार-आधारित प्रतिमान की ओर विकसित हुई है, जिसमें विधायी, अवसंरचनात्मक एवं वित्तीय उपकरण मिलकर 2.6 करोड़ से अधिक दिव्यांगजनों के समावेशन को आकार देते हैं।
यह ऐतिहासिक विधान 2016 में अधिनियमित किया गया — 2018 में नहीं — जिसने 1995 के पूर्ववर्ती अधिनियम को प्रतिस्थापित कर भारत को UN Convention on the Rights of Persons with Disabilities के अनुरूप बनाया। इसने मान्यता प्राप्त दिव्यांगताओं की श्रेणियाँ 7 से बढ़ाकर 21 कीं, सरकारी रोजगार एवं उच्च शिक्षा में आरक्षण अनिवार्य किया तथा अभिगम्यता एवं गैर-भेदभाव सुनिश्चित करने हेतु सरकारों पर विधिक दायित्व आरोपित किए। प्रवर्तन का उत्तरदायित्व राज्य आयुक्तों एवं केंद्रीय मुख्य आयुक्त पर निहित है।
2015 में प्रारंभ Accessible India Campaign (Sugamya Bharat Abhiyan) तीन क्षेत्रों को लक्षित करती है: निर्मित पर्यावरण, परिवहन प्रणालियाँ और सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी। यह सरकारी भवनों, हवाई अड्डों, रेलवे स्टेशनों तथा डिजिटल प्लेटफार्मों को अभिगम्य बनाने हेतु समयबद्ध लक्ष्य निर्धारित करती है, जो बाधा-मुक्त जीवन के प्रति समग्र-सरकारी दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करती है।
National Divyangjan Finance and Development Corporation, Ministry of Corporate Affairs के अधीन नहीं, अपितु Ministry of Social Justice and Empowerment के अंतर्गत कार्य करता है। यह दिव्यांगजनों को कौशल विकास एवं उद्यमिता हेतु रियायती ऋण तथा सूक्ष्म-वित्त प्रदान करता है और राज्य चैनलाइजिंग एजेंसियों के माध्यम से जमीनी स्तर के लाभार्थियों तक निधि पहुँचाता है।
सुदृढ़ विधिक एवं कार्यक्रमात्मक ढाँचे के बावजूद, भौतिक अभिगम्यता ऑडिट सार्वजनिक अवसंरचना में व्यापक अनुपालन-विफलता उजागर करते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में दिव्यांगता प्रमाण-पत्र प्राप्त करना कठिन बना हुआ है, जिससे पात्रताओं तक पहुँच सीमित होती है। शिक्षा, स्वास्थ्य एवं आजीविका योजनाओं के मध्य अभिसरण हेतु जिला-स्तरीय समन्वय को और सुदृढ़ किए जाने की आवश्यकता है।
दिव्यांगता अधिकारों को विधि-पुस्तक से व्यावहारिक जीवन में रूपांतरित करने के लिए कठोर अनुपालन निगरानी, पर्याप्त बजटीय आवंटन तथा समुदाय-स्तरीय शिकायत निवारण अनिवार्य है — ताकि विधायी आशय प्रशासनिक जड़ता या संसाधन-बाधाओं से निष्प्रभावी न हो।
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