Vote on Account एक महत्त्वपूर्ण संसदीय उपकरण है, जो नए वित्तीय वर्ष के प्रारंभ से पूर्व पूर्ण केंद्रीय बजट पारित न हो पाने की स्थिति में सरकारी व्यय की निरंतरता सुनिश्चित करता है।
संविधान के Article 116 के अंतर्गत Lok Sabha को किसी वित्तीय वर्ष के एक भाग हेतु अनुमानित व्यय के संबंध में अग्रिम अनुदान स्वीकृत करने का अधिकार है। यह प्रावधान कार्यपालिका को Appropriation Act के अधिनियमन की प्रतीक्षा किए बिना Consolidated Fund of India से निधि आहरित करने की अनुमति देता है, जिससे वित्तीय वर्ष के आरंभ में प्रशासनिक अवरोध से बचा जा सकता है।
Vote on Account को संविधान के Article 110 के अंतर्गत Money Bill नहीं माना जाता। इसे Lok Sabha द्वारा एक सरलीकृत प्रक्रिया के माध्यम से स्वतंत्र अनुदान के रूप में पारित किया जाता है, जिसमें नियमित बजट जैसी विस्तृत संसदीय जाँच नहीं होती। Rajya Sabha को इस पर मतदान का अधिकार नहीं है, किंतु यह Money Bill वर्गीकरण के कारण नहीं, बल्कि संसदीय परंपरा के आधार पर है।
स्थापित संसदीय परंपरा के अनुसार Vote on Account सामान्यतः वार्षिक अनुमानित व्यय के एक-छठे भाग तक, अर्थात लगभग दो माह के व्यय तक, सीमित रहता है। तथापि यह एक परंपरा है, संवैधानिक अनिवार्यता नहीं; चुनावी वर्षों अथवा असाधारण परिस्थितियों में सरकार अधिक अनुदान की माँग कर सकती है।
यह उपकरण विशेष रूप से चुनावी वर्षों में प्रासंगिक होता है, जब निवर्तमान सरकार अंतरिम बजट प्रस्तुत करती है। यह नई व्यय प्रतिबद्धताओं को सीमित कर नीतिगत अतिक्रमण को रोकता है और नई सरकार द्वारा पूर्ण बजट प्रस्तुत किए जाने तक राजकोषीय तटस्थता बनाए रखता है।
Vote on Account प्रशासनिक निरंतरता और संसदीय जवाबदेही के मध्य संतुलन स्थापित करता है। इसके उपयोग में पारदर्शिता सुनिश्चित करना — विशेषतः चुनावी वर्षों में — वित्तीय शासन में विधायिका की सर्वोच्चता बनाए रखने के लिए अनिवार्य है।
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